तुलसी विवाह की ये विधि दाम्पत्य जीवन की कठिनाइयों को करेगी दूर

by | Nov 7, 2019 | Astrology | 0 comments

एस्ट्रोलॉजी में हमारे धार्मिक पर्वों का भी बहुत महत्व होता है। उन्ही पर्वों में तुलसी विवाह भी बहुत शुभ अवसर माना जाता है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी एकादशी कहते हैं। इसे देव उठनी ग्यारस भी कहते हैं। मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु चार महिने के बाद नींद से जागते हैं। देवश्यनी एकादशी पर भगवान विष्णु के सोने के बाद सभी शुभ कार्य बंद हो जाते हैं। इसके बाद जब भगवान विष्णु अपने निंद्राकाल से जागते हैं तब धरती पर एक बार फिर से सभी शुभ कार्य आरंभ हो जाते हैं। कार्तिक मास में आने वाली एकादशी को देवोत्थान, देवउठनी या प्रबोधिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन तुलसी पूजा का भी काफी महत्व है। इस बारे में अधिक जानकारी दे रहे हैं प्रसिद्ध ज्योतिष पंडित विशाल दयानंद शास्त्री।

क्यों किया जाता है तुलसी विवाह?

इसके अलावा इस दिन को तुलसी विवाह के नाम से भी जाना जाता है। देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी का विवाह शालिग्राम से कराया जाता है। शालिग्राम को भगवान विष्णु का ही प्रतीक माना जाता है। शालिग्राम और तुलसी की शादी संनातन धर्म के अनुसार पूरे रीति-रिवाज से कराई जाती है। शास्त्रों के अनुसार जब देवता जागते हैं तो सबसे पहली प्रार्थना तुलसी की ही सुनते हैं। इसके अलावा जिन लोगों के यहां कन्या नहीं होती। वह लोग भी इस दिन तुलसी विवाह कराकर कन्यादान का लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

अन्य कारण भी हैं तुलसी विवाह के

हमारी प्रचलित मान्यता अनुसार प्रबोधिनी एकादशी को देव उठनी एकादशी और देवुत्थान एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इस दिन से विवाह, गृह प्रवेश तथा अन्य सभी प्रकार के मांगलिक कार्य आरंभ हो जाते हैं। माना जाता है कि भगवान श्रीविष्णु ने भाद्रपद मास की शुक्ल एकादशी को महापराक्रमी शंखासुर नामक राक्षस को लम्बे युद्ध के बाद समाप्त किया था। थकावट दूर करने के लिए क्षीरसागर में जाकर सो गए थे। चार मास पश्चात फिर जब वे उठे तो वह दिन देव उठनी एकादशी कहलाया। तुलसी विवाह के अलावा इसके और भी अनेक कारण माने जाते हैं। इस दिन भगवान श्रीविष्णु का सपत्नीक आह्वान कर विधि विधान से पूजन करना चाहिए। इस दिन उपवास करने का विशेष महत्व है। माना जाता है कि यदि इस एकादशी का व्रत कर लिया तो सभी एकादशियों के व्रत का फल मिल जाता है। और व्यक्ति सुख तथा वैभव प्राप्त करता है और उसके पाप नष्ट हो जाते हैं।

यह है देव उठनी एकादशी का महत्व

कार्तिक शुक्ल एकादशी को देवोत्थनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन से विवाह, गृह प्रवेश तथा अन्य सभी प्रकार के मांगलिक कार्य आरंभ हो जाते हैं। देव उठनी एकादशी पर देवताओं के जागने पर सब मंगल ही होता है। सभी शुभ कार्यों की शुरुआत देव उठनी ग्यारस से ही मानी जाती है।

विधि के साथ करें तुलसी पूजा

इस दिन तुलसी पूजा के साथ व्रत रखने को भी बड़ा महत्व दिया जाता है। महिलाएं इस दिन आंगन में गेरू तथा खड़ी से मांडणे सजाती हैं और तुलसी पूजा के साथ ही गीत एवं भजन आदि के साथ सभी उत्सव मनाते हैं।

स्वर्ग में भगवान श्रीविष्णु के साथ लक्ष्मीजी का जो महत्व है वही धरती पर तुलसी का है। इसी के चलते भगवान को जो व्यक्ति तुलसी अर्पित करता है उससे वह अति प्रसन्न होते हैं। बद्रीनाथ धाम में तो यात्रा मौसम के दौरान श्रद्धालुओं द्वारा तुलसी की करीब दस हजार मालाएं रोज चढ़ाई जाती हैं। आपके गमले में तुलसी का पौधा लगा है उसे गेरु आदि से सजाकर उसके चारों ओर मंडप बना दें। फिर उसके ऊपर सुहाग की प्रतीक चुनरी को ओढ़ा दें।

इसके अलावा गमले को भी साड़ी में लपेट दें और उसका श्रृंगार करें। इसके बाद सिद्धिविनायक श्रीगणेश सहित सभी देवी−देवताओं और श्री शालिग्रामजी का विधिवत पूजन करें। एक नारियल दक्षिणा के साथ टीका के रूप में रखें और भगवान शालिग्राम की मूर्ति का सिंहासन हाथ में लेकर तुलसीजी की सात परिक्रमा कराएं। इसके बाद आरती करें। इस तरह तुलसी पूजा से आपके वैवाहिक जीवन की सभी समस्याएं दूर होती हैं।

व्रत कब करें पारणा?

एकादशी के व्रत को समाप्त करने को पारण कहते हैं। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना जरूरी है लेकिन अगर द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही करना चाहिए।

देव उठनी ग्यारस पर आधारित ये पोस्ट आपको पसंद आई हो तो इसे शेयर करें। कमेंट सेक्शन में अपने विचार लिखें और पोस्ट को रेटिंग देना न भूलें।

इसी तरह की अन्य जानकारी के लिए हमारे एस्ट्रोलॉजी सेक्शन को भी ज़रूर देखें। हॉरोस्कोप से जुड़ी अन्य जानकारी के लिए वामा टुडे के लाइफस्टाइल सेक्शन को भी ज़रूर विज़िट करें।