पेरेंट्स को इसलिए साथ नहीं सुलाना चाहिए बच्चों को

by | Sep 7, 2019 | Pregnancy & Parenting | 0 comments

प्रेग्नेंसी और पेरेंटिंग में आपके दायित्व हर पल बदलते रहते हैं। ऐसे में पेरेंट्स के सामने दुविधा रहती है कि वे क्या करें, जिससे बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले। हर जगह लोगों की सोच बदलती जाती है। हम बात कर रहे हैं देश और उसकी संस्कृति की। जी हां, हम जो सोचते हैं ज़रूरी तो नहीं कि किसी अन्य देश में भी लोग वैसी ही सोच रखते होंगे। फिर चाहे वह किसी भी बात को लेकर हो। अब बच्चों की परवरिश को ही ले लीजिये। एक चीज़ आपने नोट की हो तो आप पायेंगे कि विदेशों में कपल बच्चों को साथ नहीं सुलाते हैं। इसके पीछे कारण बहुत तो नहीं हैं पर जो भी हैं वह मायने रखते हैं। हो सकता है ये मैरिड लाइफ को प्रभावित करता हो। या यह भी संभव है कि इससे रिलेशनशिप प्रॉब्लम्स खड़ी हो जाएं।

अब जो माता-पिता ऐसा करते हैं उनके दिमाग में यह यक्ष प्रश्न उठना स्वाभाविक है। चलिए आपको बता देते हैं कि आपको क्यों अपने बच्चों को अपने साथ नहीं सुलाना चाहिए।

पेरेंट्स को हरदम चौकन्ना रहना

बच्चे को साथ सुलाने से मां को हर-पल सतर्क रहना पड़ता है। कही बच्चा नीचे तो नहीं आ जायेगाॽ बच्चे ने गीला तो नहीं कर दिया हैॽ बच्चा उठ तो नहीं गयाॽ ऐसे तमाम प्रश्न मां के ज़हन में चलते रहते हैं। अब बताइए ऐसे में मां को नींद कैसे आएगीॽ और मां को नींद नहीं आएगी तो सीधा असर उसके स्वास्थ्य पर होगा। इसलिए विदेशों में महिलाएं बच्चों को साथ में नहीं सुलाती हैं।

अब फिर से अपने देश का रुख करें तो यहां स्थिति बिलकुल ही अलग है। यहां तो बड़े बच्चों को भी पेरेंट्स साथ सुलाने में परहेज़ नहीं करते हैं। और भारतीय महिलाओं को तो आप जानते ही हैं बच्चों और परिवार के लिए पूरी तरह से समर्पित। ऐसे में अपने बारे में वह सोचती ही नहीं हैं। लेकिन ऐसा नहीं किया जाना चाहिए।

नवजात बच्चों को लेकर पेरेंट्स को होती है परेशानी

यह बात खासकर मांओं के लिए चिंता की बात हो सकती है। देखा भी जाता है कि बच्चे के जन्म के बाद मां पूरी तरह मातृत्व में गुम हो जाती है। वैसे यह होना भी चाहिए। क्योंकि बच्चे की ज़िम्मेदारी उठाना आसान तो है नहीं।

लेकिन आप यदि विदेशी माओं को देखेंगे तो वह नवजात बच्चों को भी अपने पास नहीं सुलाती। इससे क्या उनके मातृत्व पर संदेह किया जायेॽ बिलकुल नहीं। लेकिन इसके पीछे एक कारण है सहजता। इसका अर्थ हुआ कि मां खुद आराम से सो सकेगी तभी तो बच्चे को सम्हाल सकेगी। बच्चा अगर अलग सोता है तो इससे मां भी निश्चिंत होकर सो सकती है। वर्ना मां की नींद पूरी न होना एक समस्या बन सकती है।

मैरिड लाइफ में बढ़ती दूरी

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि विदेशों में तो बच्चों को साथ सुलाना तलाक तक का कारण बन जाता है। स्वाभाविक-सी बात है कि इससे मैरिड लाइफ में एक बोझ तो बढ़ता ही है। नहीं, हम बच्चों को बोझ नहीं कह रहे हैं। हमारा तो यह कहना है कि जब पेरेंट्स अपने शारीरिक जरूरतों को पूरा नहीं कर पाते तो दूरी बढ़ती है। इसलिए आप भी इस बात को ध्यान में रखिये। ऐसा नहीं है कि आप बच्चों को दूर सुलायेंगे तो इससे उन्हें कोई नुकसान होगा। बस आप शुरू से ही आदत डालें कि बच्चों को अलग सुलाएं।

हां अगर छोटा बच्चा है तो आप उसे पास में ही क्रेब में सुलाएं। इससे आप समय-समय पर उसे देख भी सकेंगी और आपकी नींद भी अच्छे से हो जायेगी। लेकिन बच्चा बीमार है तो फ़िर तो हम यही कहेंगे कि उसे मां की ज़रूरत है।

बड़े बच्चों को सुलाना बिलकुल सही नहीं

चलिए छोटे बच्चों की बात तो हो चुकी है। अब अगर हम बड़े बच्चों की बात करें तो यहां तो आपको सतर्क रहना होगा। आपने बच्चे को शुरू से ही यह आदत डाली है तो फिर इसे आप चाहकर भी नहीं छुडवा सकती हैं। और बच्चे की यह आदत आपके लिए परेशानी का सबब भी बन सकती है। एक शोध के मुताबिक 3 साल की उम्र से ही बच्चों में गहन जिज्ञासा की भावना बढ़ने लगती है। मैरिड लाइफ के लिए भी ये एक तरह का अलार्म है। इससे दम्पत्ति के बीच रिलेशनशिप प्रॉब्लम्स बढ़ने लगती हैं।

जब आप बच्चे को अपने पास सुलाना जारी रखते हैं तो कुछ प्रश्नों की ओर वह सहज प्रवत्त होता है। इससे आने वाले समय में वह अधूरी जानकारी के अभाव में वह रास्ते से भटक भी सकता है। इसलिए बच्चों को आप अलग सुलाएं। हां इससे उसमें शारीरिक परिवर्तनों को लेकर प्रश्न तो हमेशा ही उठेंगे, लेकिन इतनी जल्दी नहीं।

रिलेशनशिप प्रॉब्लम्स को बढ़ाती ये आदत

यदि आपके बीच रिलेशनशिप प्रॉब्लम्स बढेंगी तो इसका असर बच्चों पर भी होगा। पेरेंट्स के बीच बढ़ते झगड़े बच्चों को भी परेशान करते हैं। तो आप भी अपने बच्चों को सुलाते समय यह ध्यान रखें कि उनका कमरा अलग हो। इससे आप भी निश्चिंत हो सकेंगे और बच्चे में भी आत्मनिर्भरता का भाव आएगा।इससे आपकी मैरिड लाइफ भी खुशहाल रहेगी। रिलेशनशिप प्रॉब्लम्स से भी आप दूर रह पायेंगे।

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